यादें आती हैं
यादें जाती हैं
ख्यालों के गहरे समंदर में
यादें चुभती हैं, यादें ही हंसाती हैं
यादें रुलाती हैं, यादें ही मनाती हैं
मातम-सा मौन हो या जश्न-ओ जीत का पर्व
झोका हवा का बन यादें निकल जाती हैंऔर अंत में इतिहास का एक धुल भरा पन्ना बन जाती हैं
कभी रूकती ही नहीं ये यादें, चुप चाप निकल जाती हैं,
जब छोड़ दे साथ अपना भी साया, देती हैं ये साथ, या कहूँ कि यूँही सताती जाती है,


ख्यालों के गहरे समंदर में
ReplyDeleteयादें चुभती हैं, यादें ही हंसाती हैं..
bahut badhiya...
धन्यवाद....
ReplyDeleteमनोभावों की सार्थक और प्रशंसनीय प्रस्तुति
ReplyDeleteआगामी शुक्रवार को चर्चा-मंच पर आपका स्वागत है
ReplyDeleteआपकी यह रचना charchamanch.blogspot.com पर देखी जा सकेगी ।।
स्वागत करते पञ्च जन, मंच परम उल्लास ।
नए समर्थक जुट रहे, अथक अकथ अभ्यास ।
अथक अकथ अभ्यास, प्रेम के लिंक सँजोए ।
विकसित पुष्प पलाश, फाग का रंग भिगोए ।
शास्त्रीय सानिध्य, पाइए नव अभ्यागत ।
नियमित चर्चा होय, आपका स्वागत-स्वागत ।।
आप बहुत अच्छा लिखते हो!
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